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बिहार टेंडर घोटाले की जांच में बड़ा मोड़, रिशुश्री से पूछताछ के लिए SVU ने तैयार किए 100 सवाल

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बिहार के चर्चित टेंडर घोटाले की जांच तेज हो गई है। SVU ने गिरफ्तार ठेकेदार रिशुश्री से पूछताछ के लिए 100 सवाल तैयार किए हैं और कोर्ट से 7 दिन की रिमांड मांगी है। मामले में कई बड़े नामों के सामने आने की चर्चा है।

पटना/आलम की खबर:बिहार के बहुचर्चित टेंडर घोटाले की जांच अब ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है जहां से कई महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं। इस मामले में गिरफ्तार ठेकेदार रिशुश्री को जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क की सबसे अहम कड़ी मान रही हैं। यही कारण है कि विशेष निगरानी इकाई (SVU) ने उससे विस्तृत पूछताछ की तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार एजेंसी ने करीब 100 सवालों का एक विस्तृत खाका तैयार किया है और अदालत से सात दिनों की रिमांड की मांग की है ताकि मामले की तह तक पहुंचा जा सके।

बिहार में पिछले कुछ समय से यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जांच एजेंसियों का मानना है कि टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के पीछे एक संगठित नेटवर्क सक्रिय था, जिसके तार कई स्तरों तक जुड़े हो सकते हैं। ऐसे में रिशुश्री से होने वाली पूछताछ को पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है।

जानकारी के अनुसार विशेष निगरानी इकाई ने अदालत में रिमांड आवेदन दाखिल कर यह दलील दी है कि न्यायिक हिरासत में रहते हुए कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब हासिल नहीं हो सकते। एजेंसी का कहना है कि आमने-सामने बैठाकर विस्तृत पूछताछ की आवश्यकता है, जिससे आर्थिक लेन-देन, संपर्कों के नेटवर्क और टेंडर प्रक्रिया में कथित हेरफेर से जुड़ी जानकारी जुटाई जा सके।

फिलहाल रिशुश्री न्यायिक हिरासत में है और उसे पटना के बेउर केंद्रीय कारागार में रखा गया है। मामले में गिरफ्तार अन्य आरोपियों पर भी जांच जारी है। हालांकि जांच एजेंसियों की नजर मुख्य रूप से रिशुश्री पर टिकी हुई है क्योंकि शुरुआती जांच में उसके कई प्रभावशाली लोगों और विभिन्न स्तरों के अधिकारियों से संपर्क होने की बात सामने आई है। इसी वजह से एजेंसियां यह समझना चाहती हैं कि आखिर उसने इतना व्यापक नेटवर्क कैसे तैयार किया।

सूत्रों के मुताबिक पूछताछ का सबसे बड़ा फोकस टेंडर प्रक्रिया में कथित सेटिंग और कमीशन व्यवस्था पर रहेगा। जांचकर्ता यह जानना चाहते हैं कि सरकारी निविदाओं में लाभ प्राप्त करने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा यह भी पता लगाया जाएगा कि कथित तौर पर मिलने वाली राशि का वितरण किस प्रकार किया जाता था और इस पूरी व्यवस्था में कौन-कौन लोग शामिल थे।

जांच का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक गतिविधियों और कंपनियों का नेटवर्क है। एजेंसियों को संदेह है कि कई कंपनियों का इस्तेमाल वित्तीय लेन-देन और कारोबारी गतिविधियों को संचालित करने के लिए किया गया हो सकता है। इसी कारण SVU उन कंपनियों की भी पड़ताल कर रही है जिनका संबंध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रिशुश्री या उसके सहयोगियों से जुड़ा बताया जा रहा है।

अधिकारियों का मानना है कि किसी भी बड़े आर्थिक अपराध में धन के स्रोत और उसके प्रवाह की जानकारी सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसलिए पूछताछ के दौरान यह जानने की कोशिश की जाएगी कि विभिन्न कंपनियों में निवेश कहां से आया, उनका संचालन कैसे हुआ और क्या इन कंपनियों का उपयोग किसी विशेष उद्देश्य से किया गया था। जांच टीम कथित बेनामी संपत्तियों और रिश्तेदारों के नाम पर किए गए निवेशों की भी जानकारी जुटाने की तैयारी में है।

टेंडर घोटाले के तकनीकी पहलुओं पर भी एजेंसी विशेष ध्यान दे रही है। वर्तमान समय में अधिकांश सरकारी निविदाएं ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से होती हैं। ऐसे में जांचकर्ता यह समझना चाहते हैं कि यदि कोई अनियमितता हुई तो वह किस स्तर पर हुई और उसके लिए किन तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल किया गया। एजेंसी के कुछ सवाल ई-टेंडरिंग सिस्टम, दस्तावेजी प्रक्रियाओं और निविदा प्रबंधन से जुड़े हो सकते हैं।

जांच का दायरा केवल बिहार तक सीमित नहीं माना जा रहा है। एजेंसियों की नजर विदेश यात्राओं और बाहरी संपर्कों पर भी है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर जांच टीम यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि पिछले वर्षों में हुई यात्राओं का उद्देश्य क्या था और क्या उनका संबंध किसी कारोबारी या आर्थिक गतिविधि से था। यदि पूछताछ में इस दिशा में कोई महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है तो जांच का दायरा और व्यापक हो सकता है।

राजनीतिक हलकों में भी इस मामले को लेकर काफी चर्चा है। विपक्ष लगातार मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। ऐसे माहौल में SVU की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि रिमांड अवधि जांच एजेंसियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसी दौरान वे आरोपी से सीधे सवाल-जवाब कर कई तथ्यों की पुष्टि कर सकती हैं। यदि अदालत सात दिन की रिमांड मंजूर करती है तो आने वाले दिनों में मामले से जुड़े कई नए पहलू सामने आ सकते हैं। हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच पूरी होना और न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।

फिलहाल पूरा मामला अदालत के फैसले पर टिका हुआ है। यदि रिमांड की अनुमति मिलती है तो बिहार के इस चर्चित घोटाले की जांच एक नए चरण में प्रवेश करेगी। जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि पूछताछ के जरिए पूरे नेटवर्क, आर्थिक गतिविधियों और कथित संरक्षण देने वालों की भूमिका को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। यही वजह है कि इस मामले को हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण जांचों में से एक माना जा रहा है।

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बिहार का टेंडर घोटाला केवल एक आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ा प्रश्न है। यदि जांच में टेंडर प्रक्रिया में किसी प्रकार की संगठित गड़बड़ी सामने आती है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।

जांच एजेंसियों को बिना किसी दबाव के निष्पक्ष तरीके से काम करने का अवसर मिलना चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़े, न कि केवल चर्चाओं या अटकलों के आधार पर। जनता को भी अंतिम निष्कर्ष आने तक धैर्य रखना चाहिए।

यदि दोषियों की पहचान होती है और उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई होती है, तो यह भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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